Sunday, 12 October, 2008

दीवारों से मिलकर रोना अच्छा लगता है

दीवारों से मिलकर रोना अच्छा लगता है हम भी पागल हो जायेंगे ऐसा लगता है

दुनिया भर की यादें हमसे मिलने आती है, शाम ढले इस सुने घर में मेला लगता है

कितने दिनों के प्यासे होंगे यारो सोचो तो, शबनम का कतरा जिनको दरिया लगता है

किसको कैसर पत्थर मारू कौन पराया है, शीशमहल में एक एक चेहरा अपना लगता है

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