Saturday 18 October 2008

मेरी नजर

कौन सा है रास्ता जो यों मुझे बुला रहा?

धुंधला ये स्वप्न मुझे कौन है दिखा रहा?


बदली कई बार मग़र राह अभी मिली नहीं

चलने को जिसपर मेरा मन कुलबुला रहा।


बैठ! थ! यों ही, पर वैसे ना रह सक!

सफ़र कोई और है जो मुझे बुला रहा।


यहाँ-वहाँ, कहीं-कोई, झकझोर सा मुझे गया

कोई है सवाल जो पल-पल मुझे सता रहा।

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